या पुस्तकाविषयी
महाराष्ट्र के सूफियों की रुहानी तौर पर खुत्चावाव, ौलताबाद और परिसर से जोडी गयी। इसकी वजह राजनैतिक थी। महंमत तुघलक के कार्यकाल में राजधानी दैहली से वैवगिरी स्थलांतरित हुओ। सूफियों की सात सौ पालकियाँ दख्खन में आयी। आज का इलाकों जो मराठवाडा कहलाता है सूफियों के प्रेम से आनंद विभोर हो उठा। महाराष्ट्र में शायद ऐसी जगह बची हो जहाँ सूफियों का पदस्पर्श ना हुआ हो। लेखक महोदयने सूफियों के धर्मप्रचार का धर्मप्रसार का जायज़ा लिया है, उसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महाराष्ट्र की सहिष्णुता निखरकर सामने आ जाती है।
इन चिरंतन मूल्यों का परिपोष करने के लिए भारत के साधु संतोंने और सूफियोंने अपनी उम्र वक्फ कर दी। देश के कोने कोने में जहाँ जहाँ बस्ती बसी वहाँ वहाँ इनकी चरणरज लगी। मेरे सुहृद प्रोफेसर एजाज साहब ने सांप्रत स्थिती को सामने रखकर महाराष्ट्र की सूफी परंपरा इस ग्रंथ की रचना की है। अपने-आप में यह बड़ी उपलब्धी है। साधु-संत और सूफियों से उनको लगाव है। इस लगाव का मैं मानवता से लगाव मानता हूँ। महाराष्ट्र के सूफियों पर हिंदी मे लिखा यह प्रथम ग्रंथ है। अखिल भारतीय स्तरपर योगदान देनेवाले सूफियों के दर्शन का और विचारों का सम्यक विश्लेषण एजाज़ साहबने किया है। इस बात का विशेष उल्लेख करने का कारण यह कि, इसके बिना महाराष्ट्र के सूफियों के विचारों को न्याय देना संभव नहीं है। महाराष्ट्र में सूफी विचार के पौधे देहली से लाकर बोये गये हैं। ऐतिहासिक तथ्यों से यकिनी तौरपर यह बात कही जा सकती है।
पुस्तकाची छायाचित्रे
अभिप्राय आणि मानांकन
अजून अभिप्राय नाही — या पुस्तकाबद्दल तुमचे मत नोंदवणारे पहिले व्हा.
अभिप्राय लिहिण्यासाठी साइन इन कराइथे अजून काही लिहिलेले नाही.